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आजकल की इस भागती दुनिया में हम इतने ज्यादा व्यस्त होते जा रहे हैं कि हम खुद को भूलने लगे हैं हमारे मन में इतने विचार चलते रहते हैं कि वह हमें शांति से बैठने ही नहीं देते जब कभी थोड़ा सा समय मिलता है हमें शांति से बैठने का तो हमारे दिमाग में फिर से तमाम विचार आने लगते हैं और फिर हम यह भूल जाते हैं कि हम शांति पूर्वक बैठे हैं कि नहीं अर्थात हमारा दिमाग विचारों से इतना ज्यादा भर जाता है कि वह हमें शांति से एक जगह पर बैठ ही नहीं देता तो आज के इस वीडियो में हम अपने मन के विचारों को साफ करके अपने दिमाग को किस तरीके से शांत रखा जाए इसी के बारे में बात करने वाले हैं दोस्तों एक बार एक गुरु और एक शिष्य एक सुनसान जंगल से गुजर रहे थे तभी शिष्य अपने गुरु से एक सवाल करता है कि गुरु जी ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोगों के पास कुछ भी नहीं होता लेकिन फिर भी वह सुखी रहते और आनंद में रहते हैं और कुछ लोगों के पास सब कुछ होते हुए भी उदासी उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती है गुरु ने एक मुरझाए हुए फूल की तरफ इशारा करते हुए अपने शिष्य से कहा कि यह सोचने और समझने की बात है अगर यह फूल यह सोचेगा कि मैं कल मुरझा गया था या फिर यह सोचेगा कि मैं भविष्य में फिर से मुर्झा जाऊंगा तो यह कभी भी खुलकर पूरी तरीके से खेल नहीं पाएगा अपने सुंदर स्वरूप में यह कभी भी वापस नहीं आ पाएगा और अपनी इस प्रकृति में कभी भी बिखेर नहीं पाएगा इसी प्रकार इंसान अपने अतीत की यादों में खोया रहता है या फिर अपने भविष्य की करता रहता है भविष्य के दुखों के बारे में सोचता रहता है या भूत में जो उसके साथ बुरी घटनाएं घटित हुई हैं वह उन्हीं के बारे में सोच सोच करके वह अपने भविष्य के लिए चिंतित होता रहता है तो ऐसा मनुष्य जीवन में कभी भी सुख अनुभव नहीं कर सकता यह समझने की बात होती है कि जीवन हमेशा वर्तमान में होता है अतीत और भविष्य की कल्पनाएं हमेशा मनुष्य को मृत्यु की तरफ ले जाती हैं इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि जिस प्रकार हम अपने शरीर की देखभाल करते हैं उसे बीमारियों से दूर रखने के लिए उसके अंदर ऐसी गंदगी भी साफ करते रहते हैं ठीक उसी प्रकार समय-समय पर हमें अपने मन और मस्तिष्क की भी गंदगी को साफ करते रहना चाहिए उसकी धुलाई करते रहना चाहिए इससे आपकी बुद्धि की क्षमता तो तेज होगी ही होगी साथ ही साथ आप हमेशा आनंद में रहने का रहस्य भी जान पाएंगे शिष्य ने सवाल किया कि गुरुदेव इससे पहले कि हम मन और मस्तिष्क पर चर्चा शुरू करें इससे पहले मैं यह जानना चाहता हूं कि जिन लोगों के पास सब कुछ होता है वह दुखी क्यों रहते हैं और जिन लोगों के पास कुछ भी नहीं होता है वे अक्सर आनंद में क्यों होते हैं यह रहस्य क्या है इसके पीछे का कारण क्या हो सकता है गुरु ने उत्तर दिया कि कुछ लोग जीवन में जब कुछ हासिल कर लेते हैं और सब कुछ हासिल कर लेने के बाद उन्हें सब चीजों की व्यर्थ का पता चल जाता है ऐसे लोगों को अक्सर यह एहसास जकर लेता है कि मैंने जीवन में कुछ भी पाया जो कुछ भी किया उससे भले ही मैंने सुख सुविधाएं हासिल कर ली हो लेकिन मन की शांति अभी भी बहुत दूर है और अधूरी भी है उस तक में पहुंच नहीं पाता सब कुछ पाकर भी मैं अपने मन को जान नहीं पाया और जब इंसान को ऐसा लगता है तो उसे महसूस होता है कि जो कुछ भी उसने कमाया है वह कोरियों का भाव था उसने अपना जीवन बेकार की चीजों में यूं ही व्यर्थ कर दिया और वहीं पर जिस इंसान के पास जीवन में कुछ भी नहीं होता है उसके पास एक उम्मीद होती है सब कुछ पाने की लालसा रखता है और वही लालसा वही इच्छा उसको जीवन में खुश रखती है आगे बढ़ाती है और ऊर्जा से वह हमेशा भरा रहता है गुरु ने अपने हाथ से एक सूखे पेड़ की तरफ करते हुए कहा कि शिष्य कभी तो यह पेड़ भी हरा भरा रहा होगा फलों से लदा हुआ रहा होगा अनेक प्रकार के पक्षी और जानवर इस पर आराम करते होंगे इसके फलों को खाते होंगे इस समय इस पैर को भी यह पता नहीं होगा कि एक दिन यह सूख जाएगा और उसकी हालत इतनी बदतर हो जाएगी कि यह किसी को छाव तक नहीं दे पाए उसके ऊपर पत्ते तक नहीं रह जाएंगे उसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन की दौड़ में यह भूल जाता है कि जिस दौड़ में वह सबसे आगे निकलने की कोशिश कर रहा है उसका अंतिम चरण तो मृत्यु ही है काश वह कभी इस दौड़ से अलग हटकर यह देख पाए कि इसका अंतिम चरण उसे कहां तक पहुंचाएगा जिस दौर से वह सबसे आगे निकलकर जीतने के ख्वाब देख रहा है उसका वास्तव में अंतिम चरण मृत्यु ही है काश व कभी जीवन में भी हो जाता है कि उन घटनाओं को हम किसी भी तरह अपने मन की द्वार में ठहरा करर यह देख पाए कि उसका चरण क्या है और उसका परिणाम क्या होने वाला है वह तो बहुत कुछ इकट्ठा करने में लगा हुआ है एक दिन वह सब यहीं का यहीं रह जाएगा इकट्ठा करते करते एक दिन उसका शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा और फिर उसका शरीर आग में जलकर राख हो जाएगा लेकिन उसके द्वारा बनाई हुई चीज सब यहीं की यहीं परही रह जाएगी लेकिन इंसान चीजों को इकट्ठा करते करते अपनी जिंदगी को जीना भूल जाता है वह कभी ठीक से खुलकर हंस भी नहीं पाता बस इकट्ठा कर में लगा रहता है और इकट्ठा करते करते वह अपने सब सुख चयन खुशी सब कुछ खो देता है ऐसा भी हो सकता है कि वह ऐसे कार्यों की तरफ आगे बढ़ सकता है जो उसके जीवन में आनंद पैदा करता हो जो उसके जीवन को एक नई दिशा दे गुरु ने कहा कि एक योगी ही होता है जो जीवन की दौर में ठहर जाता है जो यह समझ लेता है कि जीवन का अंतिम चरण तो मृत्यु ही है इसीलिए वह जीवन में सुख सुविधाएं हासिल कर करने की बजाय खुद के मन और मस्तिष्क को एक नए आनंद की तरफ ले जाने का प्रयास शुरू कर देता है शिष्य ने सवाल किया कि गुरुदेव क्या एक गृहस्थ जीवन में जीने वाला मनुष्य उस आनंद की प्राप्ति नहीं कर सकता और अगर कर सकता है तो किस प्रकार शुरुआत उसे करनी चाहिए गुरु ने कहा कि बिल्कुल कर सकता है गुरु ने उत्तेजित होकर उत्तर दिया कि अगर सभी मनुष्य उस आनंद की प्राप्ति के लिए योगी बनने का निश्चय कर ले तो इससे तो प्रकृति का चलन ही रुक जाएगा उसकी जो व्यवस्था है वह बिगड़ने लगेगी एक सच्चा योगी अपने जीवन में खोज करता है और खोज करने के बाद वह गृहस्थ जीवन में किस प्रकार आनंद को प्राप्त किया जा सकता है वह तरीके सभी को बताता है ताकि मनुष्य अपने गृहस्थ जीवन का पालन करते हुए उस आनंद की प्राप्ति भी कर सके गुरु ने उस युवक को संबोधित करते हुए उत्तर दिया कि मैंने अपने जीवन में जो खोज की है उसके अनुसार मनुष्य को समय-समय पर अपने मन और मस्तिष्क की सफाई करते रहना चाहिए मनुष्य अपने शरीर पर तो ध्यान दे देता है लेकिन अपने मन और मस्तिष्क को वह भूल जाता है उस पर कभी ध्यान ही नहीं देता और उसी वजह से मन और मस्तिष्क उसके बूढ़े होते चले जाते हैं उसमें जवानी रह ही नहीं जाती और जब उनमें जवानी नहीं रह जाती तो वह नया पन और ताजगी नहीं रह जाती जिसकी वजह से एक इंसान उदासी से भर जाता है मान और मस्तिष्क की गंदगी क्या होती है पहले मैं तुम्हें यह बताता हूं हर मनुष्य के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जिनका उसके मन और मस्तिष्क पर बहुत ही गहरा असर डालती है वह जीवन पर्यंत उन घटनाओं को भुला भी नहीं पाता और वही घटनाएं उसके मन में पूरी तरह से पक्की बैठ जाती हैं जो उसके मन में गांठ बना लेती है और भविष्य में जब भी वह कोई काम करता है तो यह घटनाएं उसको प्रभावित करती है उसके विचारों को उसके निर्णय को पूरी तरह से घटनाए बदल कर रख देती हैं ऐसे मनुष्य की दृष्टि भी भ्रमित हो जाती है वह सत्य स्वरूप को देख ही नहीं पाता वह उन चीजों को उन घटनाओं से जोड़कर भ्रमित तरीके से देखता रहता है उदाहरण के लिए अगर किसी बुरी आंखें वाले आदमी ने आपको धोखा दे दिया है तो आप जीवन पर्यंत बुरी आंखें वाले आदमी को हमेशा धोखेबाज ही समझते रहेंगे उस पर कभी पूर्ण रूप से आप विश्वास ही नहीं कर पाएंगे लेकिन समझने की बात यह होती है कि जिस इंसान ने आपको धोखा दिया है वह धोखा आपको बुरी आंखों से नहीं मिला वह इंसान के स्वभाव से मिला है लेकिन उस इंसान के स्वभाव से हमारे दिमाग में उसका एक चित्र छप गया उसकी एक छवि बन गई और वह छवि दूसरे आदमी से जब हम संपर्क करते हैं तो बीच में एक दीवार की तरह खरी हो जाती है और इसी वजह से दो लोगों के बीच गहरे संबंध स्थापित नहीं हो पाते तो मनुष्य के लिए सबसे जरूरी यही होता है कि वह अपने आप को अतीत की घटनाओं से मुक्त रखे उन घटनाओं से प्रभावित होकर वह दिमाग में किसी तरह की छवि ना बनाए कुछ लोग इस बात पर यह सवाल खरा कर सकते हैं कि फिर जीवन के अनुभव किस काम में आएंगे लेकिन समझने की बात तो यह होती है कि हम जीवन के अनुभवों को भी भ्रमित तरीके से जान लेते हैं सही तरीके से उनसे सीख ही नहीं पाते शिष्य अपने गुरु की बातों में इतना खो गया कि उसे चलते चलते जंगल के रास्ते में परे हुए कांटे दिखा नहीं दिए और अचानक उसके पैर में कांटा छुप गया गुरु ने उसका कांटा बाहर निकालते हुए उससे पूछा यह कांटा तुम्हारे पैर में क्यों लगा इसके पीछे तुम किसे जिम्मेदार मानते हो गुरु ने कहा कि तुम मुझे भी जिम्मेदार मान सकते हो क्योंकि मैं तुम्हें यह बातें सुना रहा था या तुम खुद को भी जिम्मेदार मान सकते हो कि तुम मेरी बातों में इतना खो गए कि तुम्हारा रास्ते पर से ध्यान ही नहीं रहा या तुम इन पैरों को भी जिम्मेदार मान सकते हो जिन्होंने यह कांटे इस रास्ते पर बिछा दिए तभी शिष्य ने उत्तर दिया कि गुरुदेव इसमें मैं खुद को ही जिम्मेदार मानता हूं क्योंकि आप तो अपना काम कर रहे थे और इस पैर ने भी अपना काम किया पर मैं अपना काम होश पूर्वक नहीं कर पाया अगर मैं चलते समय ध्यान लगाए रहता अगर मैं आपकी बातों में पूरी तरह से नहीं हो जाता तो मुझे यह कांटा कभी नहीं लगता इसमें पूरी तरह से ही मेरी गलती है गुरु ने शाबाशी से अपने शिष्य के पीठ को थपथपा आया और आगे कहा कि जो घटनाएं हमारे मन को प्रभावित करती है जरूर उसे बाहर निकाल दें और उसके लिए सबसे सरल तरीका है कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सीखो उसे अपने दिल में अपने मस्तिष्क में बैठाकर मत रखो जब तुम किसी दूसरे मनुष्य के सामने अपनी भावनाओं को व्यक्त कर देते हो तो तुम्हारे मन का बोझ हल्का हो जाता है कुछ लोगों का स्वभाव ऐसा होता है कि वह अपने मन की बात किसी को बताते ऐसे लोग अक्सर अंदर ही अंदर दुखी होते रहते हैं लेकिन वह अपने मन की बात किसी दूसरे आदमी को कभी नहीं बताते उसके कुछ उल्टे ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने मन में किसी भी बात को रख नहीं पाते उनके साथ कुछ भी अच्छा या बुरा होता है वह अपने मन की बात अपने भावनाओं की बात दूसरों के सामने व्यक्त कर देते हैं और तुमने खुद महसूस किया होगा कि जो लोग अपने मन की भावनाओं को व्यक्त कर देते हैं वह जीवन में ज्यादा आनंदित रहते हैं कभी भी प्राकृतिक रूप से आए हुए भावनाओं को नहीं रोकना चाहिए या हमें किसी भी भावनाओं को दबाना नहीं चाहिए अगर हम किसी भी भावनाओं को रोकने की कोशिश करते हैं तो वे हमें अंदर ही अंदर खाने लग जाती हैं गुरु ने आगे कहा कि शिष्य अगर तुम्हारा मन किसी बुरी घटना पर रोने को हो रहा है तो चीख चीख कर रो लो अपने आप को रोको मत उस भावना को पूरी तरह से बाहर आने दो अगर किसी दूसरे दूसरी घटना पर तुम्हारा मन खुश होने का आनंदित होने का हो रहा है तो पूरी तरह से नाचो गाव जिससे कि तुम उस भावना को बाहर निकाल सको और जब वे भावनाएं अपनी पूरी गति के साथ बाहर आ जाती हैं तो तुम्हारा मन उन घटनाओं को पीछे छोड़ देता है अर्थात तुम्हारा मन धीरे-धीरे हल्का होने लगता है गुरु ने शिष्य को समझाते हुए बताया कि जिस प्रकार तेज रफ्तार से चलता हुआ पानी अपने वेग से आने वाली सभी बाधाओं को तड़ देता है और अगर हम अपनी भावनाओं को बहने दिए तो वह उन सभी बाधाओं को तड़ देगा और उस बांध को ड़ने के बाद उसका कचरा उसके मन से निकल जाएगा और उसका चित्त मन भी साफ हो जाएगा उसके अंदर की गंदगी भी दूर हो जाएगी अक्सर मनुष्य अपने मन में किसी घटना को दबाकर इसलिए रखता है कि वह सोचता है कि अगर सामने वाले को इस घटना के बारे में पता चल जाएगा तो वह क्या सोचेगा इसी विचार से वह अंदर ही अंदर खुद दुखी होता रहता है और अपनी भावनाओं को दबाता रहता है लेकिन सामने वाले को वह कुछ भी नहीं बताता लेकिन अगर एक बार अगर वह हिम्मत करके शुरुआत कर सकता है अपने अंदर की बात अपने किसी करीबी मित्र को बता दे तो उसका पूरा जीवन परिवर्तित हो सकता है उसका जीवन सुखमय बन सकता है एक बार अगर उसके दिमाग में यह आदत बन गई तो जीवन भर अपनी भावनाओं को दूसरों के सामने व्यक्त करने से कभी नहीं हिचक जाएगा हम अपने जीवन में इस आदत को 21 दिनों में पैदा कर सकते हैं 21 दिनों तक अगर सही तरीके से हम अभ्यास करें तो हमारा दिमाग पूरी तरह से भावनाओं से मुक्त हो सकता है यह 21 दिनों का अभ्यास इस प्रकार है 21 दिनों तक सबसे पहली बात जो आपको याद रखनी है कि अपने मन में किसी भी बात को दबाकर नहीं रखना है अगर हम किसी मनुष्य के बारे में अच्छा सोचते हैं तो हम उसे करें अगर बुरा भी सोचते हैं तो भी उसे व्यक्त करें परिणाम भूल जाए कि परिणाम क्या होंगे सिर्फ अपने दिमाग की धुलाई करने पर विश्वास रखें इससे आपके दिमाग में एक अद्भुत साहस पैदा होगा गुरु ने आगे कहा कि शिष्य जब आप किसी मनुष्य के बारे में वह सब बता पाएंगे जो आप उसके बारे में सोचते हैं तो आप खुद सोचिए कि आपका खुद के ऊपर कितना विश्वास बरत जाएगा आपके मन के सारे दोष खत्म हो जाएंगे हो सकता है कि इसमें आपको चुनौतियों का सामना भी करना पड़े लेकिन जहां चुनौतियां नहीं होती हैं वहीं कुछ अभ्यास भी नहीं होता है अभ्यास हमेशा चुनौतियों से भरा होना चाहिए इससे आप सत्य वचन बोलने का अभ्यास भी कर पाएंगे अक्सर हम दूसरों को प्रभावित करने के लिए वह सब बोलते रहते हैं जो उन्हें अच्छा लगता हो लेकिन वह नहीं बोलते जो हम उनके बारे में सचमुच सोचते हैं और यही हमारी सबसे बड़ी भूल हो जाती है जिससे हमारा पूरा अस्तित्व झूठ ठा बनकर रह जाता है और अपनी भावनाओं को व्यक्त करते समय यह भी जरूर ध्यान रखें कि आपके अंदर जो भावनाएं उस इंसान के प्रति उठ रही हैं उसके पीछे का मूलभूत कार्य क्या है उदाहरण के लिए जब एक नौकर अपने मालिक के लिए कोई काम करता है और वह काम अच्छे से नहीं कर पाता है तो मालिक उसे डांट फटकार देता है जिससे उसके अंदर उसके प्रति क्रोध की भावनाएं उठने लगती हैं लेकिन समझने की बात यह होती है कि मालिक तो आपको क ही वह तो डांटे ही अगर आप अच्छे से काम नहीं करेंगे अगर आप काम अच्छे से कर रहे हैं और फिर भी आपका मालिक आपके साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहा है तो आप खुलकर अपने मालिक को भावनाएं व्यक्त कर सकते हैं बिना यह सोचे कि इसका परिणाम क्या होगा अगर आप इस भावना को उठाएंगे नहीं तो आप अपनी नजरों में खुद ही नीचे गिरने लग जाएंगे आपका आत्मविश्वास बिल्कुल खत्म हो जाएगा दूसरा अभ्यास जो 21 दिनों तक करना है वह यह है कि जो भी घटनाएं तुम्हारे साथ घटित होती हैं कम से कम आपके जीवन में एक ऐसा इंसान होना चाहिए जिसके सामने तुम अपने दिल की बात रख सकते हो चाहे अच्छी बात हो चाहे बुरी बात हो वह सब बातें तुम बिना कुछ सोचे विचारे बिना कुछ डर से कि वह इंसान तुम्हारे बारे में क्या सोचेगा तुम उस इंसान को अपनी सारी बातें बता सको और वह इंसान तुम्हारी सारी बातें सुनने के बाद तुम्हारे लिए कोई छवि पैदा ना कर करे ऐसे इंसान अपने जीवन में खोजो और उनके सामने अपनी सारी भावनाएं व्यक्त करने की कोशिश करो दिन में जो कुछ भी घटित होता है अच्छा लगता है या बुरा होता है किसी के प्रति आकर्षण होता है उसको एक दोस्त की तरह बताने का प्रयास करें इससे यह पता चल जाएगा कि तुम्हारा मन घटनाओं के प्रति किस प्रकार की भावनाएं पैदा करता है तुम अपने मन की सारी बातें कह दो ताकि तुम्हारे अंदर की भावनाएं तुम्हारे अंदर में जो विचार उत्पन्न हो रहे हैं वह पूरी तरह खाली हो जाए तीसरा अभ्यास जो तुम्हारे मन को खाली रखेगा वह है योग्य निद्रा का अभ्यास देखते ही देखते यह चर्चा खत्म करते हुए गुरु और शिष्य उस जंगल को पार करके अपने आश्रम में पहुंच चुके थे तो दोस्तों उम्मीद है इस वीडियो से आपको काफी कुछ सीखने को मिला होगा और अगर कुछ सीखने को मिला हो तो हमारे इस वीडियो को लाइक शेयर और बुधा स्टोरिय चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिएगा और साथ ही कमेंट में नमो बुद्धाय जरूर लिखिए धन्यवाद...
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